भूख से बचने के लिए दोपहर तक सोता था:अन्नू कपूर बोले- जेब खाली थी, ड्राइवर ने बुरे वक्त में नहीं छोड़ा, कहा- पाप लगेगा
भोपाल से मुंबई तक अन्नू कपूर का सफर संघर्षों से भरा रहा। आर्थिक तंगी के कारण उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी। परिवार चलाने के लिए उन्होंने चाय बेची, चाट का ठेला लगाया, लॉटरी टिकट बेचे और ऑटो रिक्शा चलाया। गरीबी ने उनका आईएएस बनने का सपना छीन लिया, लेकिन अभिनय ने नई पहचान दिलाई। जेब में सिर्फ 419 रुपए 25 पैसे लेकर मुंबई पहुंचे अन्नू कपूर को चेहरे की वजह से रिजेक्ट किया गया, लेकिन अपनी प्रतिभा के दम पर उन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार जीतकर साबित किया कि असली हीरो चेहरा नहीं, हुनर होता है। आज की सक्सेस स्टोरी में जानते हैं अन्नू कपूर के करियर और निजी जीवन से जुड़ी बातें… गरीबी ने छीन लिया आईएएस बनने का सपना 20 फरवरी 1956 को भोपाल के एक साधारण परिवार में जन्मे अन्नू कपूर का बचपन आर्थिक परेशानियों में बीता। उनके पिता मदनलाल कपूर पारसी थिएटर चलाते थे, जबकि मां कमल शबनम क्लासिकल गायिका और शिक्षिका थीं। घर में कला का माहौल था, लेकिन आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो जाता था। अन्नू कपूर पढ़ाई में अच्छे थे और उनका सपना आईएएस अधिकारी बनने का था, लेकिन परिवार की हालत ने उन्हें यह सपना छोड़ने पर मजबूर कर दिया। परिवार चलाने के लिए किया हर छोटा-बड़ा काम जब घर की जिम्मेदारी आई तो उन्होंने कोई काम छोटा नहीं समझा। एक इंटरव्यू में अन्नू कपूर ने कहा था, “मैंने अपनी जिंदगी चलाने के लिए चाय बेची, फ्राइड फूड का स्टॉल लगाया। कठिनाइयां मेरे जीवन में नई नहीं थीं। समस्याओं को तो मैंने बचपन से जिया है। चाय बेचने के अलावा उन्होंने चाट का ठेला लगाया, लॉटरी टिकट बेचे और ऑटो रिक्शा चलाया। उस समय उनके लिए सबसे जरूरी था कि किसी तरह परिवार का खर्च चलता रहे। लेकिन मुश्किलों के बीच अभिनय का सपना कभी खत्म नहीं हुआ। थिएटर बना जिंदगी बदलने का रास्ता बचपन से घर में थिएटर का माहौल था। पिता मंच पर अभिनय करते थे, इसलिए अन्नू कपूर का झुकाव रंगमंच की ओर बढ़ा। उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) में दाखिला लिया। यहीं से उनकी अभिनय यात्रा को दिशा मिली। हालांकि, यहां भी उन्हें संघर्ष करना पड़ा। एक बार मशहूर थिएटर निर्देशक बैरी जॉन एक नाटक के लिए कलाकार चुन रहे थे। ऑडिशन में अन्नू कपूर सबसे ज्यादा अंक लेकर पहले स्थान पर रहे, लेकिन चेहरे को किरदार के लिए उपयुक्त नहीं मानने के कारण उन्हें रोल नहीं मिला। इस घटना ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया। बाद में अन्नू कपूर ने इस घटना को याद करते हुए कहा था, “मैं सबसे ज्यादा अंक लेकर आया था, लेकिन मुझे कहा गया कि तुम्हारे पास उस किरदार वाला चेहरा नहीं है। उस दिन मैं मानसिक रूप से बहुत परेशान हुआ था।” यही वह पल था, जब उन्होंने तय किया कि अब उन्हें चेहरे से नहीं, अभिनय से पहचान बनानी है। 70 साल के बूढ़े का किरदार बना टर्निंग पॉइंट एनएसडी के दिनों में अन्नू कपूर ने नाटक ‘एक रुका हुआ फैसला’ में 70 साल के बुजुर्ग का किरदार निभाया। तब उनकी उम्र करीब 25 साल थी, लेकिन अभिनय इतना प्रभावशाली था कि दर्शक उनकी असली उम्र का अंदाजा नहीं लगा पाए। संयोग से नाटक देखने निर्देशक श्याम बेनेगल भी पहुंचे थे। श्याम बेनेगल अन्नू कपूर की अदाकारी से प्रभावित हुए और उन्होंने उन्हें फिल्म ‘मंडी’ (1983) के लिए चुन लिया। यहीं से संघर्षरत थिएटर कलाकार के फिल्मी सफर की शुरुआत हुई। एनएसडी में अभिनय की बारीकियां सीखने के बाद अन्नू कपूर के सामने सवाल था- अब आगे क्या? थिएटर पहचान दे रहा था, लेकिन रोजी-रोटी नहीं। ऐसे में उन्होंने मुंबई का रुख किया, जहां लाखों लोग सपनों के साथ आते हैं और हजारों सपने टूट जाते हैं। जेब में सिर्फ 419 रुपए 25 पैसे लेकर पहुंचे मुंबई मुंबई आने का फैसला आसान नहीं था। जेब में महज 419 रुपए 25 पैसे थे। रहने का ठिकाना पक्का नहीं था और फिल्मों में काम मिलने की गारंटी भी नहीं थी। टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में अन्नू कपूर ने बताया था कि मुंबई आने के समय उनके पास सिर्फ 419.25 रुपए थे। उन्हें भरोसा था कि ईमानदारी से अभिनय करेंगे तो एक दिन पहचान जरूर मिलेगी। चेहरे की वजह से बार-बार हुए रिजेक्ट मुंबई पहुंचते ही उन्हें एहसास हुआ कि यहां सिर्फ अभिनय नहीं, चेहरा भी मायने रखता है। उस दौर में हिंदी फिल्मों में लंबे, गोरे और पारंपरिक हीरो जैसे दिखने वाले कलाकारों को प्राथमिकता मिलती थी। अन्नू कपूर इन मानकों पर फिट नहीं बैठते थे। रिजेक्शन लगातार मिल रहे थे, लेकिन उन्होंने तय कर लिया था कि अगर हीरो नहीं बन सकते, तो ऐसा अभिनेता बनेंगे जिसे लोग कभी भूल न सकें। श्याम बेनेगल ने बदली किस्मत एनएसडी के दौरान नाटक में उनका अभिनय देखकर निर्देशक श्याम बेनेगल पहले ही प्रभावित हो चुके थे। उन्होंने अन्नू कपूर को 1983 में फिल्म ‘मंडी’ में मौका दिया। रोल छोटा था, लेकिन इंडस्ट्री के बड़े निर्देशकों की नजर उन पर पड़ गई। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। धीरे-धीरे उन्होंने ‘उत्सव’, ‘चमेली की शादी’, ‘मिस्टर इंडिया’, ‘तेजाब’, ‘राम लखन’ जैसी फिल्मों में अलग-अलग किरदार निभाए। स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी भले कुछ मिनटों की होती, लेकिन दर्शक उन्हें नजरअंदाज नहीं कर पाते थे। अनिल कपूर से अन्नू कपूर बन गए अन्नू कपूर का असली नाम अनिल कपूर ही है। अपने रेडियो प्रोग्राम ‘सुहाना सफर विद अन्नू कपूर’ में वे अनिल से अन्नू बनने का किस्सा बता चुके हैं। फिल्मों में आने के बाद उन्होंने अपना नाम अनिल से अन्नू कर लिया। प्रोग्राम में एक सवाल के जवाब में अन्नू ने बताया था- ‘अनिल कपूर और मेरी फिल्मों में एंट्री करीब-करीब एक साथ हुई थी। किसी को भ्रम न हो, हम दोनों में से किसी एक को नाम बदलना ही पड़ता, इसलिए मैंने बदल लिया।’ हर किरदार में अलग पहचान बनाई अन्नू कपूर ने खुद को किसी एक तरह के रोल तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने कॉमिक, गंभीर, खलनायक और भावनात्मक सभी तरह के किरदार निभाए। उनकी खासियत रही कि वह अपने किरदार को अभिनय नहीं, जीते थे। फिल्म इंडस्ट्री में अक्सर कहा जाता है कि “कोई रोल छोटा नहीं होता।” अन्नू कपूर ने इसे अपने करियर से सच साबित किया। टीवी ने बना दिया घर-घर का चेहरा फिल्मों में काम मिल रहा था, लेकिन असली लोकप्रियता टीवी से मिली। 1993 में उन्होंने संगीत आधारित शो ‘अंताक्षरी’ होस्ट करना शुरू किया। उनका अंदाज अलग था। बेहतरीन हिंदी-उर्दू, हाजिरजवाबी, कविता, शायरी और संगीत ज्ञान ने उन्हें बाकी एंकरों से अलग बना दिया। धीरे-धीरे लोग शो से ज्यादा अन्नू कपूर को देखने लगे। रविवार की शाम ‘अंताक्षरी’ के समय परिवार टीवी के सामने बैठ जाता था। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक उनकी एंकरिंग के प्रशंसक बन गए। आज भी भारतीय टेलीविजन के लोकप्रिय होस्ट्स में अन्नू कपूर का नाम लिया जाता है। लेकिन इस शो से पहले साढ़े चार महीने तक अन्नू कपूर बेरोजगार रहे। जेब खाली थी और एक वक्त का खाना बचाने के लिए सुबह देर तक सोते थे। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में उन्होंने उस दौर का जिक्र किया। साढ़े चार महीने ऐसा वक्त देखा, जब जेब में एक रुपया नहीं था अन्नू कपूर कहते हैं- मेरी जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन 4 मई 1992 से शुरू हुआ साढ़े चार महीने का दौर मैं कभी नहीं भूल सकता। वो मेरी जिंदगी का सबसे मुश्किल समय था। मैं एक छोटे कमरे में रहता था, जिसका किराया सिर्फ एक हजार रुपए था। हालत ऐसी थी कि जेब में एक रुपए भी नहीं था। न कोई चेक था, न शूटिंग और न ही काम। पूरा दिन खाली गुजरता था। रात को दोस्तों के घर जाकर ताश खेलता था ताकि मन हल्का हो जाए। सुबह जानबूझकर देर से उठता था, क्योंकि देर से उठने पर सीधे लंच कर लेता था और एक वक्त का खाना बच जाता था। उस दौर ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया था। ड्राइवर ने कहा- बुरे वक्त में छोड़कर गया तो पाप लगेगा उसी मुश्किल दौर में मेरे ड्राइवर केशव दत्त ने जो साथ दिया, उसे मैं कभी नहीं भूल सकता। मैंने उससे कहा था कि तू कहीं और नौकरी कर ले। मैं तुझे एचएलएल में एक बड़े अफसर के यहां लगवा देता हूं। वहां तुझे 750 रुपए की जगह 2000 रुपए तनख्वाह मिलेगी। उसने मेरी बात सुनकर कहा, “सर, मैं ब्राह्मण हूं। अच्छे वक्त में आपको छोड़ दूं तो कोई बात नहीं, लेकिन बुरे वक्त में छोड़कर गया तो मुझे पाप लगेगा। अगर अभी आप तनख्वाह नहीं दे पा रहे हैं, तो भी मैं आपके साथ हूं।” ऐसे वफादार लोग किस्मत वालों को ही मिलते हैं। ‘अंताक्षरी’ का पहला एपिसोड देखा और जिंदगी बदल गई करीब साढ़े चार महीने बाद दिल्ली में बनने वाली एक वीडियो फिल्म के लिए एक शख्स मुझे 5000 रुपए एडवांस देकर गया। इससे थोड़ी राहत मिली। लेकिन असली टर्निंग पॉइंट 3 सितंबर 1993 को आया। उस दिन मैं हमेशा की तरह दोस्त के घर ताश खेल रहा था। रात करीब आठ बजे दोस्त की पत्नी ने कहा, “अरे अन्नू जी, आप टीवी पर दिख रहे हो।” मैंने पलटकर देखा तो जी टीवी पर ‘अंताक्षरी’ का पहला एपिसोड चल रहा था, जिसे मैंने करीब डेढ़ महीने पहले शूट किया था। मैंने ताश के पत्ते नीचे रख दिए और पूरा शो देखा। शो खत्म होने के बाद दोस्त ने मुझसे कहा, “पंडित की जुबान है, आज के बाद तुझे जिंदगी में कभी पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी।” उनकी बात सच साबित हुई। ‘अंताक्षरी’ ने मेरी जिंदगी बदल दी और उसके बाद मुझे फिर कभी वैसा संघर्ष नहीं करना पड़ा। स्टार नहीं, एक्टर कहलाना पसंद था जब कई कलाकार हीरो बनने की दौड़ में थे, तब अन्नू कपूर का नजरिया अलग था। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, “मैं स्टार बनने नहीं आया था, मैं अभिनेता बनना चाहता था। स्टारडम कुछ समय का होता है, अभिनय हमेशा रहता है।” यही सोच उनके पूरे करियर में दिखाई दी। उन्होंने कभी बड़े बैनर या बड़े रोल का इंतजार नहीं किया। जो किरदार मिला, उसे पूरी ईमानदारी से निभाया। ‘विक्की डोनर’ ने बदल दी करियर की तस्वीर करीब तीन दशक तक फिल्मों और टेलीविजन में काम करने के बाद 2012 में अन्नू कपूर के करियर का बड़ा टर्निंग पॉइंट आया। निर्देशक शुजीत सरकार की फिल्म ‘विक्की डोनर’ में उन्होंने डॉ. बलदेव चड्ढा का किरदार निभाया। फिल्म का विषय अलग था और अन्नू कपूर का अभिनय इसकी बड़ी ताकतों में से एक माना गया। उनकी कॉमिक टाइमिंग, पंजाबी लहजा और किरदार की ऊर्जा ने दर्शकों और समीक्षकों दोनों का दिल जीत लिया। इस भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। यह सम्मान उनके करीब तीन दशक के संघर्ष और मेहनत की पहचान बन गया। हर दौर में खुद को बदलते रहे अन्नू कपूर ने खुद को दोहराने के बजाय नए किरदार चुने। ‘7 खून माफ’, ‘ऐतराज’, ‘जॉली एलएलबी 2’, ‘ड्रीम गर्ल’ जैसी फिल्मों में उन्होंने साबित किया कि उम्र बढ़ने के साथ उनका अभिनय और परिपक्व हुआ है। उन्होंने वेब प्लेटफॉर्म, रेडियो और टेलीविजन पर भी काम किया। रेडियो शो ‘सुहाना सफर विद अन्नू कपूर’ में हिंदी सिनेमा और संगीत की जानकारी ने श्रोताओं को प्रभावित किया। अभिनय के साथ उनकी भाषा, साहित्य और संगीत की समझ भी उनकी अलग पहचान बनी। एक किस्सा जिसने उनकी सोच बदल दी अन्नू कपूर अक्सर कहते हैं कि संघर्ष इंसान को मजबूत बनाता है। उन्होंने बताया कि गरीबी ने उन्हें सिखाया कि किसी भी काम को छोटा नहीं समझना चाहिए। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था,”मैंने जिंदगी में कोई काम छोटा नहीं माना। जो काम ईमानदारी से किया जाए, वही इंसान को आगे ले जाता है।” शोहरत मिली, लेकिन जमीन से जुड़े रहे सफलता मिलने के बाद भी अन्नू कपूर ने अपने संघर्ष के दिनों को नहीं भुलाया। वह बताते हैं कि एक समय घर चलाना मुश्किल था, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों को कमजोरी नहीं बनने दिया। उनका मानना है कि कलाकार की सबसे बड़ी पूंजी उसका हुनर होता है, न कि चेहरा या स्टारडम। रिजेक्शन को बनाया ताकत अन्नू कपूर की कहानी उन लोगों के लिए सीख है जो एक-दो असफलताओं के बाद हार मान लेते हैं। उन्हें कई बार सिर्फ इसलिए काम नहीं मिला क्योंकि वे पारंपरिक फिल्मी हीरो जैसे नहीं दिखते थे। लेकिन उन्होंने अपनी कमी को ताकत बना लिया। आज बॉलीवुड में उनका नाम उन कलाकारों में लिया जाता है जो किसी भी किरदार को यादगार बना सकते हैं। ———————————— पिछले हफ्ते की सक्सेस स्टोरी पढ़िए… हिट फिल्म के बाद भी 15 महीने बेरोजगार रहीं कृति:स्टारकिड्स ने छीने बड़े रोल, जिस किरदार पर सवाल उठे, उसी ने दिलाया नेशनल अवॉर्ड आज कृति सेनन बॉलीवुड की सफल अभिनेत्रियों में गिनी जाती हैं। उनके नाम नेशनल अवॉर्ड, कई सुपरहिट फिल्में और अपना प्रोडक्शन हाउस है। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने का रास्ता रिजेक्शन, अकेलेपन, तानों और आत्मविश्वास की लड़ाई से होकर गुजरा है।पूरी खबर पढ़ें..
